ये दावा है
लोगों का कि
उन्हें
मौह्ब्बत नहीं है
हमसे |
हम किस ज़ुबान
से दावा करें
कि ये कोई
हक़ीकत नहीं |
तेरी बेरूख़ी हर रोज़
मेरे
रेत के घरौंदे
को फना करती
है|
और बेजुबान थिरकते ये
होंठ
मेरा गला दबाय
जाते हैं |
रौशन है गर
ये शमा
तो सिर्फ़ फर्ज़ की
खातिर |
वरना मौत कब
की
हमें गाकर लोरियाँ सुनाया करती
|
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