खामोशी हद से ज़्यादा,
कुछ इस कदर
बढ़ गयी ,
के आँख बरबस
ही छलक
के बोल पड़ी |
वक्त के लम्हों
को जीना तो
है ही ,
फिर हंसी होठों
पे थिरके या
दर्द सीने में
छुपा सिसके,
इसकी फ़िक्र क्यों?
शमा ने जलकर
राख तो होना
ही है ,
फिज़ूल
की शिकायत फिर
दीपक से कैसी
||
No comments:
Post a Comment