Saturday, March 21, 2015

This is a tribute to my father on his fourth death anniversary .

Accidently called Ranchi toknow his welfare and learnt that despite ill health , he had gone to the bank to deposit some amount in my account . A reply (in Punjabi) to mild reprimand from a daughter. . . His last words

मेरी जान

ये थे वो आखिरी शब्द - -

"तँू ताँ मेरी जान ए

मेरे दिल विच वसदी येंl "

कुछ थके थके से

दर्द से भरे हुए l

मेरी आँखों से आँसू

बहे जा रहे थे ,

मगर आवाज़ मॆं लरज़ ना आऐ

हंस कर दिलासे दे रही थी - - - -

"आप ठीक हो जाओगे पापा

मगर आप बाहर क्यों गये

आराम करते ? "

उधर से थकी सी आवाज़ आई - - -

"मेरा जी कित्ता , पुत्तर जी

दस कुज गलत कित्ता ?

तूँ ताँ मेरी जान ए

मेरे दिल विच वसदी यें l

थोड़ा आराम करांं गा

ते ठीक हो जावांगा ! "

यॆ नहीँ मालूम था कि

आराम कि चिर निद्रा में सो जाएँगे ,

हमें अपनी यादों के सहारे छोड़ जाएँगे l

पर हर रोज़ रात को यह

अमर वेल सा गीत मेरे कानों में गूँजता है - - - -

"तूँ ताँ मेरी जान ए

मेरे दिल विच वसदी यें "

#Kiren Babal

2. 03. 2015


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