मिट्टी और गारे के बने
इस घर को तुम
घर कह सकते हो
मैं नहीँ ll
मेरे ज़ेहन में तो
जज्बातों का बनना संवरना ही
सही मानों में घर कहलाता है ll
घर वो है जहाँ पे मिले
सुकून बेपनाह ll
रात गुजारने को तो
कई मुसाफिर खाने हैं 11
इस घर को तुम
घर कह सकते हो
मैं नहीँ ll
मेरे ज़ेहन में तो
जज्बातों का बनना संवरना ही
सही मानों में घर कहलाता है ll
घर वो है जहाँ पे मिले
सुकून बेपनाह ll
रात गुजारने को तो
कई मुसाफिर खाने हैं 11
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