दस्ताने - ए - मुस्कान
सुनो भई सुनो . . . !
एक मज़ेदार सी दास्तां सुनाऊँ ;
मेरी हँसी ही लड़ पड़ी , मेरी अंखियॊं से l
हँसी ने मुँह तरेरा . . .
फ़िर कुछ मुँह बिचकाया ,
फ़िर समझाया . . .
तुम बड़ी अजीब हो भाई ;
बिन बादल बरसात
जब देखो , गंगा जमुना
बहाये रखती हो l
जाओ , थोड़ा डाक्टर को दिखाओ . . .
अपन इलाज कराओ ;
यूँ ही वक़्त बे वक़्त ,
सावन भादों ना बरसाओ l
हर चीज़ का एक वक़्त होता है l
ग़म में तो आँसू बहातीं हो ,
मेरी हंसी पर क्यों रोक लगाती हो ?
जब जब खिलखिलाना चाहता हूँ
तुम अपनी आँख े छलका देती हो ?
मेरे हँसते हुए चेहरे को , तुम
रोनी सूरत में बदल देती हो l
कुछ तो शरम करो . . .
ज़रा अपनी हद में रहो !
# Kiren Babal
24. 3. 2015
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