Tuesday, March 24, 2015

दस्ताने - ए - मुस्कान

दस्ताने - ए - मुस्कान 

सुनो भई सुनो . . . ! 

एक मज़ेदार सी दास्तां सुनाऊँ ; 

मेरी हँसी ही लड़ पड़ी , मेरी अंखियॊं से l 

हँसी ने मुँह तरेरा . . . 

फ़िर कुछ मुँह बिचकाया , 

फ़िर समझाया . . . 

तुम बड़ी अजीब हो भाई ; 

बिन बादल बरसात 

जब देखो , गंगा जमुना 

बहाये रखती हो l 

जाओ , थोड़ा डाक्टर को दिखाओ . . . 

अपन इलाज कराओ ; 

यूँ ही वक़्त बे वक़्त , 

सावन भादों ना बरसाओ l 

हर चीज़ का एक वक़्त होता है l 

ग़म में तो आँसू बहातीं हो , 

मेरी हंसी पर क्यों रोक लगाती हो ? 

जब जब खिलखिलाना चाहता हूँ 

तुम अपनी आँख े छलका देती हो ? 

मेरे हँसते हुए चेहरे को , तुम 

रोनी सूरत में बदल देती हो l 

कुछ तो शरम करो . . . 

ज़रा अपनी हद में रहो ! 

# Kiren Babal

24. 3. 2015

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