Monday, July 13, 2015

मनमौजी मन

यह मन भी क्या बला है,

नित नए रंग बदलता है,

इक पल हंसता, इक पल रोता,

बच्चे सा मनमौजी है।

कभी लगाए चुप्पी ऐसी,

जंग लगे ताले की जकड़न जैसी,

मकड़े जैसा जाल बुने जभी,

उसी में उलझा फिरे तभी।

कभी बिदका घोड़ा बन जाए,

कुछ खिंचा खिंचा सा दिखलाए,

निठल्ला बन जब भी है रूठे ,

कोपभवन तभी भाए उसे।

खुद तो परेशान होता है,

औरों को भी सताता है,

इसका कोई इलाज बताए,

सीधी राह कोई इसे दिखाए।

कभी बने यह डायनामाइट,

परत दर परत सब खुल जाता है,

गुबार भी सारा बह जाता है,

तब कही चैन मिल पाता है।

मन में फिर सवाल आया,

मेरा मन कैसा है?

मैंने देखा परखा,

साधु शैतान, दोनों रू पों में पाया।

प्यार से थपकी दे,

मैंने उसे समझाया---

तुम बच्चे से मनमौजी, ही

मुझे अच्छे लगते हो।

सारी कलाबाजियां छोड़,

जो मुझे सुहाय,

बच्चे सा मनमौजी,

बस वहीं बन बसों, मेरे अंदर।

हंसो और हंसाओ,

बेकल जीवन में सबके,

हो सके तो , कोशिश करो, और

थोड़ा चैन दे जाओ।

Kiren Babal

12.7.2015.

No comments:

Post a Comment