~~~~~~चाँद~~~~~~
आज चाँद को मैंने कुछ अलग निगाहों से देखा,
बहुत प्यार आया उसपर, और मन मचल गया।
काश, कि अभी इसी वक्त, लपक कर उसे मुट्ठी में बंद कर लूँ,
और लुका -छिपी का खेल , खेलूँ ।
मुट्ठी खोलूं, बंद करूँ ...मुट्ठीु खोलूं , बंद करूँ ...
जुगनू सी उसकी रोशनी...जलती -बुझती ,जलती - बुझती,
मेरी मचलती तमन्नाओं की तरह,किलकारी भरती हुई।
आज चाँद को मैंने कुछ अलग निगाहों से देखा,
बहुत प्यार आया उसपर, और मन मचल गया।
उसकी बिखरी चांदनी, झिलमिल गोटे की तार सी लगी
और मेरे चंचल मन ने ख्वाब बुन डाला ।
काश कि गोटे-दार तार में , जादुई सीढ़ी बुनी होती,
और मैं लपककर चाँद तक पहुंच जाती।
नील आर्म स्ट्रांग ने तो कदम रखा था,
उसकी चांदी सी तश्तरी में सवार,
शीतल चांदनी में नौका विहार कर रही होती।
और बैकग्राउंड में यह गीत चल रहा होता. ..
चलो दिलदार चलो....चाँद के पार चलो.......................।
Kiren Babal
9.6.2015
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