Wednesday, February 3, 2016

परवान दोस्ती

एक मीठा एहसास है

दोस्ती।

बच्चे सी मासूमियत लिए होती है

दोस्ती।

अपने ही अन्दाज़ में खिलखिलाती है

दोस्ती।

ना कुछ माँगे, ना कुछ चाहे, सीढ़ी दर सीढ़ी परवान होती है

दोस्ती।

प्यार और विश्वास के चाह की चादर ओढ़े रखती है

दोस्ती।

सुबह की गर्म प्याली की चाय की चुस्की सी, पुरजोश होती है

दोस्ती।

आँखों में सुनहले सपने संजोती है

दोस्ती।

खुद से ज्यादा दोस्तों की खैरख्वाह रखती है

दोस्ती।

जो माँगे से हासिल हो झटपट, ऐसी शह तो नहीं है, 

दोस्ती।

बस माली की सींचन की तरह

आंगन में तुलसी के पौधे की तरह,

नभ में परिंदे की ऊड़ान की तरह

मेंहदी के गहरे होते रंग की तरह

इत्र के फैलते एहसास की तरह

लम्हा लम्हा परवान होते देखो

जोगिया रंग चढ़ ही जाएगा।

Kiren Babal

15.9.2015

कुछ भी बचा न कहने को

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

मन तो अभी भरा नहीं

ये चंचल आँखें बोलती गईं ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

पर शमा की क्या कहें

ये रात भर पिघलती रही ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

गज़ल सी है यह जिंदगी

मैं मस्त मलंग सी गा रही ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

इस दिल में प्यार बेशुमार है

कुछ बूंदे तुम्हें उधार ही सही ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

पैगाम तो सारे चले गए

इंतजार में आँखें बिछी रहीं ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

वो दर्द भी क्या दर्द है

जिसने रूह को छुआ नहीं ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

चल ए मेरे मनमौजी मन

राहें चमन हैं और भी ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

ऐ साकी पिला दे और मुझे

इक पैगाम मुहब्बत के नाम सही।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

वो सलाम जो झुक कर किया मैंने

वो मस्काराहट उफ्फ, किसी जन्नत से कम नहीं ।

कुछ भी बचा न कहने को

हर बात हो गई

उन इशारों की मैं क्या कहूँ

धड़क के दिल धड़का गई ।

खिली धूप


हम जो हैं, जैसे हैं, खुश हैं, 

अपने दयार में।

पर दिलों पे नश्तर अक्सर,

अपने ही चला जाते हैं।

फिर क्यूँ ना रहें बंद,

अपने ही दरो दीवार में।

ना नश्तर की चुभन हो,

ना लहू की रिसन हो।

ना कोई यह समझे,

कि टूट कर बिखर गए।

इसीलिए होठों पे हंसी ले

खिली धूप से आ गए हम

दुनिया के बाज़ार में ।

Kiren Babal

2.8.2015

घर इनका पर सड़क किनारे

घर इनका पर सड़क किनारे।

नन्हे नन्हें हाथों से

बालू थाप थाप कर, मज़े से

घरौंदा बनाते , खेल खेल में।

फिर पैरों से कूद कूद कर

खुद ही उसे फ़ना करते हैं।

नन्ही तालियाँ , किलकारियाँ

नहीं जानती बनाना , गिराना।

बालू संग खेलते , बढ़ते बच्चे

घर इनका पर सड़क किनारे।

बच्चे तो हैं इसी जहाँ के

घर इनका पर सड़क किनारे

माँ ने यहीं बिठाया है।

चोट लगी जो माथे पर

चिंता नहीं है , पर कोई।

मट्टी इनकी, मलहम पट्टी,

फौलादी से ये बच्चे हैं।

गौर से देखो दुनिया वालों

ये बच्चे राम की गिलहरी सरीखे हैं

माँ बच्चों से खेल खिलाती, बालू भरवाती

तसले भर कर बालू ले जाती

घरौंदे बनवाती फिर तसले भरवाती

साथ में उनका मनोबल जगाती

सिर्फ एक माँ ही करने में सक्षम है।

कैसे कह दे , उसका लाल, पैदाईश मजदूर है।

यानि सरदी गरमी पतझड़ बरसात

सबसे जूझते, फिर भी खिलखिलाते

चोटें खाते, पर जाने अनजाने , हर इमारत में

नन्हे हाथों से ,अपने हिस्से की मेहनत कर

इमारते नई बनाते हैं, फौलादी से ये बच्चे

पैदाईशी कामगार से , भोले बच्चे

बालू संग खेलते , बढ़ते बच्चे

घर इनका पर सड़क किनारे।

Kiren Babal

1.11.2015

जुगाली

एक व्यंग्य कविताओं की बौछार पर,जब चाहते हुए भी सब पढ़ नहीं पाते।

जुगाली

भई , क्या रफ्तार है

चहुँ ओर कविताओं की बौछार है

ज़रा थम जाओ,

कोई होड़ लगी है क्या?

जो ऐसी भागम भाग है!

चाहने वालों का बुरा हाल है

बस पढ़ते जाओ, बढ़ते जाओ

हम भी कैसे श्रोता हैं, सभी लड्डुओं को

खाते खाते, अपच के शिकार हैं ।

भई जरा जुगाली तो करने दो

काव्य रस का पान तो करने दो

जब तक कविता मन में ना बसे

उसे जीवन वरदान कैसे मिले ?

कवि का लेखन, श्रोताओं का मंथन,

दोनों का तालमेल, प्रेमी प्रेमिका समान है।

दोनो साथ साथ हैं तो अमरप्रेम है....

रफतार में बेमेल ,कविताओं की अमावस है,

जैसे चार दिन की चाँदनी और फिर अँधेरी रात हो ।

कविता को जीना है,तो

श्रोताओं के मन में घर बनाना है

लिख कर , किसी कोनें में सरक जाए,

तो एक बंद पुलिंदे समान हैं।

मगर श्रोता तो फिर श्रोता हैं

मुड़ के फिर वहीं आते हैं

डूबते हैं , उभरते हैं, पिछड़ते हैं

फिर कविता के संग हो लेते हैं ।

Kiren Babal

30.9.2015

चिंगारियां

राख के ढेर से उठी चिंगारियां, भी 

                                           शांती के पैगाम दे जाते हैं।

धुंध का गीलापन भी,

उम्मीद का स्पंदन दे जाता है।

सर्द आहों में भी, अमन-ओ-चैन

की ख्वाहिशें सांस लेती है।

ना - उम्मीदी, कितनी गहरी क्यूँ न हो

तुम्हारे होठों की हंसी, पैगाम-ए-मुहब्बत दे जाते हैं।

Kiren Babal

24.12.2015